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द्रौपदी मुर्मू और गणतंत्र की यात्रा के पड़ाव राष्ट्रपति अगर संविधान के संरक्षक हैं

  • July 22, 2022
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द्रौपदी मुर्मू और गणतंत्र की यात्रा के पड़ाव राष्ट्रपति  अगर संविधान के संरक्षक हैं

राष्ट्रपति अगर संविधान के संरक्षक हैं औऱ गंगा भारतीय संस्कृति की संरक्षक है. नमामि गंगे को लेकर कोई पहली बार भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे हैं.

नई दिल्ली:

आज भारत को संविधान का नया संरक्षक मिला है।द्रौपदी मुरमू का राष्ट्रपति बनना पहले से ही तय था, उसकी आज पुष्टि हो गई. द्रौपदी मुरमू को बधाई. पहली बार अनुसूचित जनजाति से किसी को राष्ट्रपति भवन पहुंचने का मौका मिलने जा रहा है. द्रौपदी मुरमू ने आसानी से विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को हरा दिया है.

ज़ाहिर है यह उम्मीदों का दिन है इसलिए भी संविधान की संरक्षिका के सामने चुनौतियों का ज़िक्र ज़रूरी है. द्रौपदी मुरमू इस मामले में भी पहली राष्ट्रपति होंगी जिनका जन्म आज़ादी के बाद हुआ है. यह दृश्य यकीन दिलाता है कि किसी भी पद पर कोई भी पहुंच सकता है. किसी को कोई नहीं रोक सकता. यकीन केवल निजी मसला नहीं है बल्कि संवैधानिक संस्थाओं को भी यह भरोसा दिलाना पड़ता है.

कल ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हम पत्रकार को लिखने से कैसे रोक सकते हैं. इस बात का अध्ययन किया जा सकता है कि कितने अखबारों और चैनलों ने इस बात को महत्व दिया कि पत्रकारों को लिखने से कैसे रोक सकते हैं. संविधान के प्रावधान तभी इस्तेमाल में आते हैं जब कोई इनका इस्तेमाल करता है.  

कहने तो कई सारे न्यूज़ चैनल हैं और ढेर सारे न्यूज़ एंकर. मगर रिपोर्टर कितने हैं

कहने तो कई सारे न्यूज़ चैनल हैं और ढेर सारे न्यूज़ एंकर. मगर रिपोर्टर कितने हैं, इसी सवाल से आपको जवाब मिल जाएगा कि लिखने से रोका नहीं जा सकता मगर लिखने वाला है कहां. सारे चैनलों के कंटेंट एक ही थीम के आस-पास नज़र आते है. 2014 के बाद गोदी मीडिया ने जिस तरह आज़ादी और अधिकार शब्द पर हमला किया है,

उनकी बात करने वालों को गद्दार और एंटी नेशनल की कैटगरी में डाला है, आज़ादी की बात करने वालों को आज़ादी  गैंग कहा गया, हमें याद रखना चाहिए कि मीडिया की आज़ादी का मतलब सबके लिए एक समान नहीं है. आठ साल से इस देश में प्रधानमंत्री की एक भी खुली प्रेस कांफ्रेंस नहीं हुई है, राष्ट्रपति का चुनाव हो गया, उम्मीदवारों में एक ही उम्मीदवार का इंटरव्यू छपता रहा.

क्या गोदी मीडिया के किसी भी संपादक को यह बेचैनी हुई कि उम्मीदवार का इंटरव्यू होना चाहिए. ताकि उनकी बातों के बहाने जनता भी राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा ले सके. ऐसा लग रहा है कि यह चुनाव केवल विधायकों और सांसदों के बीच का मामला है. इस चुनाव में जनता के पास यही तो तरीका है वह उम्मीदवारों की कही बातों को लेकर बहस करे, विचार करे. सुप्रीम कोर्ट ने लिखने से मना नहीं किया है, लेकिन लिखने के लिए सवाल पूछना ज़रूरी है जिसे पत्रकारों ने बंद कर दिया है.

पत्रकार जानते हैं कि आज के भारत में लिखने की नौबत नहीं आती हैं

पत्रकार जानते हैं कि आज के भारत में लिखने की नौबत नहीं आती हैं. ख़बरें ऐसे छपती हैं जैसे कहीं और लिख कर भेजी गई हों. हिसाब से लिखना आज की पत्रकारिता हो गई है. कई पत्रकारों ने खबरों को खोजना ही बंद कर दिया है, सब ANI की बाइट ट्विट करते रहते हैं, मुख्यधारा के मीडिया में खोज कर लाई गई

खबरें अब कम छपती हैं. ऐसा लगता है कि प्रेस रिलीज़ से ही सारा अखबार निकल गया है. द वायर,स्क्रोल, न्यूज़लौंड्री, कैरवान और आर्टिकल 14 न हो तो पता ही न चले कि प्रेस रिलीज़ के अलावा भी ख़बर होती है. आप ट्विटर पर पत्रकारों को देखिए, इनकी खोज कर लाई गई खबरों को ट्विट करने तक से बचते हैं. 

कल से लेकर आज तक एक ही अच्छी बात हुई है. गोदी मीडिया के मालिक और संपादक पैदल चल कर सुप्रीम कोर्ट नहीं गए, क्या पता एक दिन चले भी जाएं कि हम तो गोदी मीडिया हैं, हम तो लिखने पर रोक लगा चुके हैं. आपने यह रोक क्यों हटाई है? इससे गोदी मीडिया में गलत संदेश जा सकता है,

हमारे ऐंकर सच लिखने बोलने लगेंगे तो दिक्कत हो जाएगी. हमारा मकसद चीख चीख कर प्रोपेगैंडा करना है. सवाल करने वालों को गद्दार बताना है. दो चार ही पत्रकार हैं जो चाहते हैं कि लिखने पर रोक न हो. बाकी तो लिखने पर रोक के तहत ही पत्रकारिता कर रहे हैं और मज़े में कर रहे हैं.

आज का ही है. पिछले दो साल में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने कई बार चैनलों के कार्यक्रमों के बारे में कहा है

अगर गोदी मीडिया के ऐंकर सवाल करने लगेंगे तो देश के युवाओं को नफरत की घुट्टी कौन पिलाएगा. हमारी ही वजह से इस देश का युवा मुर्झाया हुआ है. उसे बर्बादी में भी आनंद आता है. तभी तो किसी को फर्क नहीं पड़ता कि बिहार के मगध यूनिवर्सिटी के दो लाख छात्रों का रिजल्ट साल भर से अटका है, उनका जीवन बर्बाद हो रहा है. इसलिए फिर से विचार कीजिए औऱ पत्रकारों को लिखने से मना कीजिए. 

सुप्रीम कोर्ट ने ज़ुबैर के मामले में कहा कि पत्रकार को लिखने से नहीं रोक सकते लेकिन सूचना प्रसारण मंत्री का एक बयान दिलचस्प है. आज का ही है. पिछले दो साल में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने कई बार चैनलों के कार्यक्रमों के बारे में कहा है कि सांप्रदायिक ज़हर फैलाया जा रहा है. जब कोरोना को तबलीग जमात से जोड़ा गया तब बांबे हाई कोर्ट की टिप्पणी देख लीजिए, जब एक चैनल पर यूपीएससी जिहाद चला तब सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी देख लीजिए.  क्या तब कानून या सूचना मंत्रालय ने कोई कार्यवाही की थी, इनके बारे में जानने का प्रयास किया था? 

यह भी जानना जरुरी है कौन फैक्ट चेकर है और कौन फेक्ट चेक के पीछे रहकर समाज में तनाव खड़ा करने का प्रयास कर रहा है. उन पर कोई शिकायत करता है तो कानून के हिसाब से उसपर कार्यवाही होती है”
सूचना प्रसारण मंत्रालय को पता है कि कौन समाज में तनाव फैला रहा है. अप्रैल माह में दिल्ली के जहांगीरपुरी मामले के कवरेज को लेकर सूचना प्रसारण मंत्रालय की ही एक एडवाइज़री है, जिसमें साफ कहा गया है कि न्यूज़ चैनल सांप्रदायिक विद्वेष फैला रहे हैं. तब इन चैनलों का नाम क्यों नहीं लिखा गया, तब क्यों नहीं इनके बारे में जानना ज़रूरी समझा गया. आज सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने राज्य सभा में एक लिखित जवाब दिया है कि देश में कितनी बार इंटरनेट बंद किए जाते हैं इसका डेटा केंद्र सरकार नहीं रखती है.

राष्ट्रपति के पद के लिए द्रौपदी मुर्मू का चुना जाना आदिवासी समाज के इन लोगों के लिए भी बड़ी खबर है. पांच साल तक जेल में रहने के बाद 113 लोगों को रिहा किया गया है. एक की मौत जेल में ही हो गई. 121 लोगों पर माओवादी संगठनों से संबंध होने के आरोप में UAPA की धारा लगा दी गई थी. इतनी संख्या में आदिवासी को उठाकर पांच साल के लिए जेल में बंद कर दिया जाता है,

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट और NIA कोर्ट से ज़मानत तक नहीं मिलती है. पिछले हफ्ते NIA कोर्ट ने इन सभी को बरी कर दिया क्योंकि सबूत नहीं थे. 2017 में छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले में CRPF के 25 जवानों की हत्या हो गई थी, इसके आरोप में 6 गांवों के 121 आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया. इनमें से 15 आरोपियों ने बताया कि पुलिस ने कभी उनका बयान तक नहीं लिया

और वे जेल में पांच साल सड़ाए गए. ये हाल इस देश में जांच का।जवानों को भी इंसाफ नहीं मिला और बेकसूर आदिवासियों के साथ नाइंसाफी हो गई. यह कोई पहली घटना नहीं है, ऐसी अनेक घटनाएं आपको मिल जाएंगी. उम्मीद है पांच साल बाद रिहा हुए ये बेकसूर आदिवासी भी द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने पर राहत महसूस कर रहे होंगे. 

यह कोई रहस्य नहीं है कि तथाकथित नेशनल मीडिया आदिवासी क्षेत्रों की खबरों को कितना छापता या दिखाता है, सिर्फ यही नहीं,उनके जंगलों और जीवन को कैसे विकास का कच्चा माल समझता है. द्रौपदी मुर्मु के चुनाव ने एक मौका तो दिया ही है कि उनके बहाने आदिवासी इलाकों की खबरों पर बात हो. उनका राष्ट्रपति बनना इसलिए भी महत्वपूर्ण है. आदिवासी समाज के किसी भी नौजवान को माओवादी घोषित कर देना कितना आसान है, इसे अगर आप नहीं जानते तो फिर आप कुछ नहीं जानते हैं. सिर्फ उन्हें ही नहीं बल्कि जो भी आदिवासी समाज के हकों के लिए लड़ता है चाहें वो विनायक सेन हों या सुधा भारद्वाज उन्हें माओवदी बताने में किसी का कुछ नहीं जाता.

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