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अगर कृष्ण को प्रिय थी बांसुरी तो जानिए दूसरे भगवानों के पसंदीदा वाद्ययंत्र

  • August 19, 2022
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अगर कृष्ण को प्रिय थी बांसुरी तो जानिए दूसरे भगवानों के पसंदीदा वाद्ययंत्र

आध्यात्मिकता और धर्म में संगीत की भूमिका और महत्व काफी रहा है. खासकर भारतीय मैथॉलॉजी में तो हमारे कई भगवानों को वाद्ययंत्रों और संगीत से जोड़ा गया है. जैसे ही आप उन भगवान या देवी का ध्यान करेंगे वो अपने खास वाद्ययंत्रों के साथ आपके ध्यान में आ जाएंगे. तो जानते हैं कि किस भगवान के साथ किस वाद्ययंत्र का चोली दामन का साथ था, बगैर उसके उनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.

भगवान कृष्ण की तस्वीरों को जहां भी देखेंगे तो उनके हाथ में बांसुरी नजर आएगी. जब कृष्ण का बाल्यकाल शुरू हुआ तभी से उनके हाथों में बांसुरी आ गई. वो इसे जब बजाया करते थे तो वन्य जीवों से लेकर गोपियां तक उनकी धुनों पर मोहित हो जाती थीं. उनके धुनों पर प्रकृति नृत्य करती हुई लगती थी. पुराणों और शास्त्रों में भगवान कृष्ण की बांसुरी की धुन को अलौकिक और जादुई बताया गया है.

भगवान शिव को कला की सभी विधाओं में पारंगत बताया गया है. हमारी बहुत सी कलाओं और संगीत पर शिव का प्रभाव है. वह जितने गजब के नर्तक रहे, वैसे संगीतज्ञ और विध्यवंसक भी. उन्हें ध्यान और ज्ञान में डूबा हुआ भी माना गया है. जब वह ध्यान में लीन हो जाते थे तो उन्हें दुनिया और अपने आसपास की चीजों का ध्यान ही नहीं रहता था. ये कहा जाता था कि जब भगवान शंकर अपना डमरू बजाते थे तो दैवीय संगीत पैदा होता था. सृष्टि उस पर थिरकने लगती थी.

उनकी हर तस्वीर में आप उन्हें बगैर डमरू के देख ही नहीं सकते. हालांकि उनके डमरू के संगीत के साथ शैतानी ताकतों को चुनौती और नाश का संदेश भी दिया जाता था. उनके नटराज डांस की प्रसिद्ध मुद्रा में डमरू की भूमिका खासी अहम रही है.डमरू का ध्वनि और इसका असर व्यापक होता है और अगर इसे कोई पारंगत बजाए तो थिरकने पर मजबूत कर देता है. दिल और दिमाग में भी एक अलग असर डालता है.

ये भी कहा जाता है कि दुनिया की सबसे जटिल वीणा की रचना भगवान शंकर ने ही की थी. इसे रूद्र वीणा कहा जाता है जो दूसरी वीणाओं की तुलना में बड़ी और बजाने में कठिन होती है.

विद्या की देवी कही जाने वाली सरस्वती हमेशा वीणा के साथ नजर आती हैं. उन्हें कला, ज्ञान से संबंधित देवी माना जाता है. वह अपनी अथाह क्षमताओं और दया के लिए जानी जाती हैं. जब भी कोई संगीत का कार्यक्रम शुरू होता है या कोई संगीतज्ञ अपनी संगीत साधना की शुरुआत करता है तो सबसे पहले सरस्वती की ही पूजा की जाती है और उनका ध्यान किया जाता है.

सरस्वती के भाई नारद भी अपनी करताल के साथ विचरा करते थे. वह जहां कहीं जाते थे, वहां अपनी करताल को बजाकर नारायण-नारायण का जाप करते थे. करताल के साथ एक खास तरह की वीणा भी हमेशा उनके साथ होती ही थी.

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